अखिल भारतीय निंबार्कपीठ के पीठाधीश्वर का निधन, देशभर में शोक की लहर

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मदनगंज-किशनगढ़। अखिल भारतीय निंबार्कपीठ सलेमाबाद के पीठाधीश्वर जगदगुरु श्रीजी महाराज का शनिवार को निधन हो गया। सुबह दैनिक कार्य से निवृत्त होने के बाद अचानक श्रीजी महाराज की तबीयत बिगड़ गई। युवाचार्य श्यामशरण महाराज सहित उनके शिष्यों ने तुरंत किशनगढ़ के मार्बल सिटी अस्पताल पहुंचाया जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। श्रीजी महाराज में खून की कमी अौर लंबे समय से अल्सर की बीमारी से पीड़ित होना बताया गया। श्रीजी महाराज के देवलोक गमन की सूचना मिलते ही देशभर में शोक की लहर दौड़ गई। उनके भक्त, अनुयायियों सहित श्रद्धालुओं को गहरा सदमा लगा। श्रीजी महाराज के दर्शनों के लिए लोगों की भीड़ उमड़ना शुरू हो गई। देशभर से साधु संत, विभिन्न पीठों के पीठाधीश्वर सलेमाबाद के लिए रवाना हो गए। श्रीजी महाराज की पार्थिव देह को भक्तों, श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए रखा गया है। रविवार को उनका हिंदू रीति रिवाज से अंतिम संस्कार किया जाएगा। मुखाग्नि सलेमाबाद पीठ के उत्तराधिकारी युवाचार्य श्यामशरण महाराज देंगे। सलेमाबाद में तांता लगना शुरू हो गया। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने से सुरक्षा की दृष्टि से भारी पुलिस लवाजमा तैनात किया गया।पुलिस लाइन अजमेर सहित कई थानों की पुलिस को सलेमाबाद भेजा गया। श्रीजी महाराज का जन्म विक्रम संवत 1986 को वैशाख शुल्क प्रतिप्रदा 10 मई 1929 को सलेमाबाद गांव के श्री रामनाथ जी इंदौरिया गौड़ ब्राह्मण तथा श्रीमति सोनी बाई (स्वर्णलता) के घर हुआ। जन्म नक्षत्र के अनुसार उनका नाम उत्तमचंद रखा गया परंतु एक दिन एक महात्मा उनके घर दीक्षा लेने आए। उनकी माताजी की गोद में श्रीजी महाराज को देखकर महात्मा ने कहा कि मैया तेरा ये बालक तो साक्षात रतन है। इसके बाद घरवालाें ने उत्तमचंद की बजाय रतनलाल नाम रख लिया। सात जुलाई 1940 रविवार को 11 वर्ष एक माह 28 दिन की आयु में वैष्णवी दीक्षा आचार्य श्री बालकृष्ण शरण देवाचार्य से ली। वैष्णवी दीक्षा के बाद इनका नाम राधा सर्वेश्वरशरण पड़ा और युवराज पद पर आसीन हुए। विक्रम संवत 2000 में पांच जून 1943 में बालकृष्ण शरण देवाचार्य जी के देवलोक गमन पर आचार्य पीठ पर आरूढ़ हुए। 1944 में विक्रम संवत् 2001 मातृ 15 वर्ष की आयु में कुरुक्षेत्र में आयोजित सूर्य सहस्त्र रश्मि महायज्ञ सम्मेलन के अध्यक्ष बने। इनके देशभर में कईं संस्कृति विद्यालय, महाविद्यालय हैं। 35 ग्रंथों की रचना की है। श्रीजी महाराज के भक्तों की संख्या लाखों में है। शांत और सरल स्वभाव के श्रीजी महाराज ने देशभर में जगह-जगह मंदिर और आश्रम बनवाए।

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