Meri pyari Bindu : बुबला को चाहने वाली बिंदु कद्र नहीं करती उसके प्यार की

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पर्दे पर ही सही, परिणीति चोपड़ा की शादी इस बार हो जाती है। वरना उनकी कुछ ऐसी फिल्में रही हैं जिसमें उन्होंने शादी में वरमाला डालने के पहले ही भाग जानेवाली लड़की का किरदार निभाया है। यह अलग बात है कि ‘मेरी प्यारी बिंदु’ में उन्होंने बिंदु नाम की जिस लड़की का किरदार निभाया है उससे शादी करने के लिए अभिमन्यु उर्फ बुबला (आयुष्मान खुराना) बेकरार है। यहां तक कि उसे खोने के गम में आत्महत्या की कोशिश करता है, पर बच जाता है। बिंदु भी बुबला को चाहती है लेकिन उससे इस कदर प्यार नहीं करती है कि शादी कर ले। वह शादी करती है पर किससे, यह आखिर तक पता नहीं चलता। दर्शक सिर्फ यह जान पाता है कि उसकी एक छोटी सी बेटी है। आपको लग रहा होगा कि ये किस किस्म की प्रेमकहानी है? इस सवाल का जवाब आखिर तक पता नहीं चलेगा। हां, अगर आपने अपने मन को यह समझा लिया कि जिंदगी में भी कुछ लोग आखिर तक ठीक से समझ में नहीं आते, तो सही नतीजे पर पहुंचे हैं क्योंकि बिंदु नाम की ये लड़की समझ के बाहर है। अभिमन्यु के भी और दर्शकों के भी। वह तेलुगू मूल की है लेकिन कोलकाता में उसका परिवार बुबला यानी अभिमन्यु के ठीक बगल में रहता है। अभिमन्यु और बिंदु साथ साथ बड़े होते हैं। दोनों को जो चीज जोड़ती है, वह है पुराना हिंदी फिल्म संगीत। ‘अभी न जाओ छोड़कर के दिल अभी भरा नहीं’ जैसे कोई रोमांटिक गाने दोनों मिलकर एक कैसेट में रेकॉर्डेड रखते हैं। लेकिन शराबी पिता की वजह से बिंदु की मां एक दुर्घटना में मर जाती है और नाराज बिंदु आस्ट्रेलिया चली जाती है और फिर वहां से पेरिस। उसकी एक ही तमन्ना है गायिका बनना। फिर वह मुबंई पहुंचती है जहां अभिमन्यु भी एक बैंक में काम करने लगता है। दोनों फिर टकराते हैं। फिर बुबला की प्यारी बिंदु उससे मिलती है। उसे लगता है कि अबकी तो वो पकड़ में आ गई और वह उसे हमेशा के लिए पा लेगा। पर वो फिर उससे दूर चली जाती है। उसके चले जाने के बाद अभिमन्यु एक लेखक बन जाता है। हॉरर यानी डरावने उपन्यासों का। बह बेस्टसेलर लिखने लगता है। अब क्या फिर से बिंदु उसके जीवन में आएगी? फिल्म पुराने हिंदी-फिल्मों के गाने के भीतर के एहसासों को सामने लाती है। फ्लैशबैक के सहारे कहानी में बचपन के दृश्यों को जिस तरह दिखाया गया है उससे भी दिल के छूने वाली भावनाएं पैदा होती हैं। निर्देशक ने हास्य के जो कुछ शानदार दृश्य भी रखे हैं उससे भी जोरों की हंसी छूटती है। खासकर मुंबई के फ्लैट में जब अभिमन्यु के माता पिता आते हैं। लेकिन फिल्म का आखिरी हिस्सा एक दर्द भरी दास्तान होने के बजाए बोरियत का लम्हा बन गया है। दर्शक को लगता है आखिर में वह ठगा गया है। ऐसा नहीं कि इश्क की कहानियों में दर्द नहीं होता है। बल्कि इश्क की ज्यादातर कहानियां दर्दों से भरी पड़ी हैं। लेकिन ‘मेरी प्यारी बिंदु’ अंत में ऐसी फिल्म बनके रह जाती है मानों आप ‘शोले’ देखने गए हों और टिकट न मिलने पर ‘राम गोपाल वर्मा की आग’ देखनी पड़े।

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