राजस्थान समेत 10 प्रदेशों के प्रदूषण नियंत्रण मंडल अध्यक्षों के अधिकार सीज करने के आदेश

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जयपुर। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने राजस्थान समेत 10 प्रदेशों के स्टेट प्रदूषण नियंत्रण मंडल के चेयरमैनों के अधिकार सीज करने के आदेश दिए हैं। एनजीटी की मुख्य खंडपीठ की तरफ से जारी आदेश में कहा कि प्रदेश सरकारों की ओर से नियुक्त चेयरमैन आईएएस या आईआरएस होते हैं, मगर उनको पर्यावरण की जानकारी नहीं होती और न ही वे जल-वायु प्रदूषण की रोकथाम करने में विशेषज्ञ होते हैं। राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की चेयरमैन डॉ. अर्पणा अरोड़ा के बारे में एनजीटी ने कहा कि उनको सरकार ने खनिज विभाग का सचिव बनाने के साथ प्रदूषण बोर्ड का भी अतिरिक्त कार्यभार दे रखा है। चूंकि खनिज विभाग की क्लियरेंस भी प्रदूषण बोर्ड ही जारी करता है। ऐसे में दोनों विभागों का एक ही अधिकारी है, जो अनुचित है। यह आदेश एनजीटी खंडपीठ के जज रघुवेंद्र एस. राठौड़ तथा डॉ. सत्यवनसिंह ने 8 जून को दिए हैं। जानकारी के अनुसार एनजीटी में राजेंद्रसिंह भंडारी ने याचिका दायर कर विभिन्न प्रदेशों में याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि प्रदूषण नियंत्रण मंडलों में अध्यक्ष पद पर अधिकतर आईएएस या इसके समकक्ष अधिकारियों को अस्थायी तौर पर लगाया जाता है, जबकि इनको पर्यावरण संबंधी अनुभव नहीं होने के कारण ऐसे मुद्दों को समझने की योग्यता नहीं होती। ऐसे में पर्यावरण मामलों के विशेषज्ञ को ही प्रदूषण बोर्ड का चेयरमैन बनाया जाना चाहिए तथा वह पूर्णकालिक या निश्चित समयावधि के लिए होना चाहिए। इस पर एनजीटी ने राजस्थान समेत 10 राज्यों की सरकारों को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा था। साथ ही उनको पर्यावरण क्षेत्र में अनुभवी को ही चेयरमैन बनाने के लिए कहा था। नोटिस का उचित जवाब नहीं देने तथा आदेशों की पालना करने में लापरवाही दिखाने पर एनजीटी खंडपीठ के जज रघुवेंद्र एस. राठौड़ तथा डॉ. सत्यवनसिंह ने राजस्थान, मणिपुर, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना, हरियाणा, महाराष्ट्र में स्टेट प्रदूषण नियंत्रण मंडल के चेयरमैनों के अधिकार सीज करने के आदेश जारी किए हैं। साथ ही दिल्ली, उत्तरप्रदेश तथा पंजाब की सरकारों द्वारा 1 महीने में ही एनजीटी के आदेशों का पालना करने के लिए लिखित में देने पर उनको 3 महीने का वक्त दिया है। अगर इस अवधि में इन तीनों प्रदेशों में भी पर्यावरण के विशेषज्ञ अधिकारियों की नियुक्ति नहीं की गई तो इनके चेयरमैनों के अधिकार भी सीज हो जाएंगे। इस मामले में आगामी सुनवाई 4 जुलाई को होगी।
एनजीटी ने अपने निर्णय में कहा
जो भी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का चेयरमैन बनता है, उसे पर्यावरण संरक्षण तथा जल-वायु प्रदूषण के बारे में पूर्ण जानकारी होनी चाहिए, जिससे वह प्रदूषण की रोकथाम, नदी, झीलें, तालाब, बांध समेत अन्य जलस्रोतों को संरक्षित रख सके। चेयरमैन सदस्य सचिव को जल एवं वायु एक्ट 1974 तथा 1981 के तहत पर्यावरण मामलों की गहन जानकारी होनी चाहिए, ताकि प्रदूषण बोर्ड का संचालन सुव्यवस्थित तरीके से हो। क्योंकि बोर्ड की जिम्मेदारी भी यहीं होती है।
राजस्थान बोर्ड की चेयरमैन के पास अतिरिक्त कार्यभार को अनुचित माना
एनजीटीकी तरफ से जारी 12 पेज के फैसले में कहा गया है कि राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण मंडल की चेयरमैन डॉ. अर्पणा अरोड़ा 12 फरवरी 2014 से 3 फरवरी 2016 तक पूर्णकालिक चेयरमैन रहीं। इसके बाद उनको खनिज विभाग का सचिव बना दिया तथा 7 अप्रैल 16 से राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का अतिरिक्त कार्यभार दिया गया। माइंस के लिए क्लियरेंस प्रदूषण बोर्ड ही जारी करता है, इसकी मुख्य अधिकारी भी अरोड़ा ही हैं। ऐसे में यह उचित नहीं है।

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