श्राद्ध पक्ष में पेड़ लगाकर पितरों को प्रसन्न करें

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मृत्यु जीवन की पूर्णता है। यही प्रकृति का नियम है। इस संसार में सभी कुछ नाषवान है फिर भी मानव जन्म कुछ न कुछ सृजन के असीमित अवसर उपलब्ध करवाता है एवं किसी भी मानव मात्र का सृजन ही उस के जीवन की पूर्णता है। ऐसे सृजन व्यक्तित्व का निधन भी जीवन की पूर्णता का उत्सव बन जाता है। प्रकृति पर्यावरण एवं समाज को इनका यह अमुल्य योगदान कई पीढिय़ों तक इनके कर्तव्य से रूबरू करवाता है।
पेड़ लगाकर पृथ्वी को हरा भरा बनायें और आप पर लगा धरती माँ एवं पितरों का ऋण उतारें। हमारी भारतीय संस्कृति जो अरण्य समकृति कही गयी है जिसका अर्थ है वनों की गोद में उपजी और पर्यावरण के निकट सानिध्य में पल्लवित समस्कृति वन और जन का यह रिश्ता सदियों पुराना है। यदि हमारी पुरानी पीढ़ी पेड़ नहीं लगाती तो हमें आज फल खाने को नहीं मिलते। यद्यपि वैदिक काल से ही भारत में पर्यावरण एवं प्रकृति संरक्षण को लेकर ऋषियों – मुनियों के प्रयास सराहनीय रहे हैं जिन्होंने प्रकृति की रक्षा को धार्मिक मान्यताओं से जोड़ते हुए इसके सरंक्षण का कार्य किया। पर्यावरण परमात्मा द्वारा प्रकृति को प्रदत अनुठा उपहार है।
हिन्दु धर्म में जीवों के संरक्षण पर भी बल दिया है। पहाड़ों, नदियों व वृक्षों की पूजा प्रकृति के प्रति श्रद्धा पैदा करती है। हमारे देष में सभी धर्मों व सम्प्रदायों के मध्य भाई चारा बनाए रखने के लिए विभिन्न त्यौहार मनाए जाते हैं। बदलते परिवेश व पश्चिमी प्रभाव ने पर्वों के उद्वेश्यों से हमें दूर कर दिया है। हम सभी लोग तेजी से पर्यावरण व प्रकृति से दूर भाग रहे हैं। जल स्त्रोत तेजी से सूख रहे हैं। वर्तमान में वन्य जीवों की अनेक प्रजातीयां लुप्त हो गयी है व अनेक लुप्त होने के कगार पर है। वन्य जीवों के लुप्त होने से प्रकृति में सन्तुलन बिगड़ जाता है इस का जीता जागता उदाहरण श्राद्ध पक्ष में देखा है।
आम तौर पर कौओं को ही पित्तर का प्रतिरूप माना है लोग पितरों को पानी देते हैं और कौओं को भोजन खिलाते हैं षास्त्रों में इसका उल्लेख है। वर्तमान में कौओं की संख्या बहुत ही कम है इसलिए वे भोजन के लिए नहीं आ रहे इस का मुख्य कारण जंगल में हरियाली का कम होना है। प्रकृति वह शक्ति है जिसने धरती के समस्त प्राणियों की आवश्यकताओं का भार सहन किया हुआ है। पीपल, नीम, बरगद आदि अनेक वृक्ष जो दिन रात वायु को शुद्ध करते हैं, सांस लेने के लिए ऑक्सीजन प्रदान करते हैं ऐसे वृक्षों को धार्मिक मान्यताओं एवं आस्थाओं को जोडक़र एक दूरदृष्टि का पुनीत कार्य श्राद्ध पक्ष में करें। पौधों का प्रत्यारोपण व नयी पौध को लगाकर धरती को हरा भरा बनाकर आप पर जो धरती माँ या पितर ऋण है उसे कुछ हद तक हल्का कर सकते हैं। धरती माँ को सुरक्षित रखने के लिए हमें अधिक से अधिक पौधे लगाकर धरती माँ को हरा भरा करना चाहिए। हरियाली के बिना हमारा जीवन पतझड़ के समान है।
श्राद्ध में अगर पितरों को प्रसन्न करना है तो ब्राहण को भोजन करवा कर घर के मुखिया के साथ किसी मन्दिर या स्कूल में जा कर पितरों की याद में वृक्षारोपण जरूर करें। कवि ’’हंसराज गोस्वामी’’ जो कि अध्यात्मक एवं पर्यावरण प्रेमी हैं उन्होंने बहुत ही सुन्दर षब्द में पौधारोपण परंपरा पर लिखा है –
हर पशु – पक्षी राहगीर खातिर
जीवन में विश्राम मिलेगा ।।
प्राण – वायु से हर जीवन को
जीने का अधिकार मिलेगा।।
पेड़ लगाओ – जीवन बचाओ
नव पीढ़ी को संस्कार मिलेगा ।।
हर प्राणी से दुआऐं पाकर
सुखद सा संसार मिलेगा ।।

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