मूवी रिव्यु : खेलों में राजनीति पर सवाल उठाती है मुक्काबाज

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भारत में ऐसी कई खेल प्रतिभाएं हैं जिन्हें अगर सही मार्गदर्शन मिले तो वह सच में देश का नाम रोशन कर सकती हैं लेकिन इनका सबसे बड़ा दुश्मन जातिवाद और भ्रष्टाचार है जो खेल में इनके साथ ‘गेम’ खेलता है। साफ शब्दों में कहें तो इन्हें आगे नहीं बढऩे देता है। अनुराग कश्यप की फिल्म ‘मुक्काबाज़’ खेल में इस गंदे गेम को उजागर करती है। फिल्म की पूरी कहानी ‘मुक्काबाज़’ श्रवण पर बेस्ड है जिसे अपने सपने पूरे करने के लिए तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
फिल्म की कहानी बरेली से शुरु होती है जहां श्रवण सिंह (विनीत सिंह) नाम का एक बॉक्सर रहता है जो खुद को उत्तर प्रदेश का माइक टाइसन कहता है और जिसका सपना राष्ट्रीय स्तर का चैंपियन बनने का है। अपने सपने को पूरा करने के लिए वह स्थानीय दबंग कोच भगवान दास मिश्रा (जिमी शेरगिल) के यहां बॉक्सिंग सीखता है। लेकिन गन्दी सोच और जातिवाद के कारण उसे मौका नहीं दिया जाता है। जिसका श्रवण जमकर विरोध करता है और अपना दुश्मन भगवान दास को बना लेता है। लेकिन इस बीच श्रवण को भगवान दास की गूंगी भतीजी सुनैना (जोया हुसैन) से प्यार हो जाता है। दोनों एक दूसरे को पसंद करते हैं और शादी करना चाहते हैं। लेकिन दोनों का ये रिश्ता भगवान दास को पसंद नहीं होता है। फिर शुरू होता है श्रवण और रसूखदार दबंग भगवान दास के बीच संघर्ष। फिल्म की पूरी कहानी श्रवण के मुक्काबाज बनने के कठिन संघर्ष पर आधारित है।
‘मुक्काबाज’ डायरेक्टर अनुराग कश्यप की फिल्म है। फिल्म का डायरेक्शन कमाल का है। विनीत सिंह और जिमी शेरगिल के जबरदस्त एक्टिंग से सजी इस फिल्म के डायलॉग्स इसे और शानदार बनाते हैं। जिसमें इलाहाबाद और बनारस का टच देखने को मिलता है। फिल्म में विनीत सिंह ने एक मंझे हुए अभिनेता की तरह से काम किया है। उन्होंने फिल्म के लिए खुद बॉक्सिंग सीखी। जो इसे और भी ख़ास बनाती है। वहीं जिमी शेरगिल एक दबंग की भूमिका में बिलकुल फिट दिखे। रवि किशन और जोया हुसैन ने बेहद संजीदगी से अपने किरदार को पर्दे पर उकेरा है। फिल्म में सभी किरदारों ने कमाल की एक्टिंग की है।

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