सर्वोच्च न्यायालय के चार न्यायाधीशों के बगावत के पीछे भी सोहराबद्दीन केस का भूत?

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अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी गेलेप द्वारा भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को विश्व के तीसरे सबसे ज्यादा लोकप्रिय नेता घोषित किया उसी दिन देश की सर्वोच्च न्यायालय के सबसे वरिष्ठ चार न्यायाधीशों ने मीडिया से कहा कि सुप्रीम कोर्ट नहीं बचाया गया तो लोकशाही खत्म हो जाएगी वह जाहिर करके मोदी सरकार की लोकप्रियता और प्रतिष्ठा के सामने सवाल किया है। देश के इतिहास में यह प्रथम घटना है की जिसमें सुप्रीम के मुख्य न्यायमूर्ति के सामने एक नहीं बल्कि चार-चार न्यायाधीशों ने बगावत की हो। मोदी सरकार भले यह दिखावा कर रही हो कि इससे सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन हकीकत यह है कि अंदर से मोदी सरकार हिल गयी है।
सूत्रों की मानें तो सुप्रीम के जिन चार न्यायाधीशो जिसमें न्यायाधीश कुरियन जोसेफ, चेलमेश्वर, गोगोई और मदनमुकरे ने दिल्ही में संवाददाता सम्मेलन बुलाकर कहा की अगर सुप्रीम कोर्ट में चल रही गड़बडी को रोका नहीं गया तो भारत में लोकशाही खत्म हो जायेगी। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की कार्यपद्धति का सख्त शब्दों में विरोध किया है। जिस में सोहराबुद्दीन एन्काउन्टर मामले की सुनवाई कर रहे सीबीआई के विशेष न्यायाधीश बी एच लोया की रहस्यमय मौत का मुद्दा मुख्य मामला है यह माना जा रहा है। चार न्यायाधीशों ने जो खत लिखा है उस में न्यायाधीश लोया की रहस्यमय मौत की जांच करने के लिए हुई पीआईएल वरिष्ठ न्यायाधीश की कोर्ट को सौंपे जाने की बजाय कनिष्ठ न्यायाधीश को दिये जाने से यह चार न्यायाधीश नाराज हुए, ऐसा माना जा रहा है। सूत्रों की माने तो वास्तव में जो चित्र धीरे धीरे सामने आ रहा है उसमें जज लोया का रहस्यमय मौत का मामला केन्द्र में है। गौरतलब है कि जज लोया की मृत्यु काफी रहस्यमय परिस्थतियों में हुई थी। पीआईएल में इस बारे में विस्तृत जानकारी के साथ आरोप लगाया गया है। सोहराबुद्दीन मामले में एक राजकीय बाहुबली नेता का भविष्य जुडा है।
सूत्रों ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी दाओस जाने वाले है। वैसे तो हर साल दाओस में वर्ल्ड इकोनॉमी फोरम के बैनर के तहत परिषद का आयोजन होता है। लेकिन इस बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद हाजिर रहने वाले है तो शाहरुख खान को भी वहां जाने वाले हैं ओऱ उनका सन्मान भी होने वाला है। दाओस में मोदी की उपस्थिति उनकी प्रतिष्ठा के लिए बडी कही जा सकती है लेकिन उनकी इस मुलाकात से पहले ही सर्वोच्च न्यायालय के चार न्यायाधीशों ने ही देश की सर्वोच्च न्यायालय पर प्रश्न चिन्ह उठाया है वह चिंताजनक है।
देश का आम नागरिक भरोशा रखता है कि सरकार या कहीं और से उसे यदि न्याय नहीं मिला तो उसे न्यायालय से न्याय मिलेगा। अब जबकि न्यायालय में में ही सब सही नहीं चल रहा है और देश के मुख्य न्यायाधीश की कार्यप्रणाली का विरोध कर रहे चार न्यायाधीश ने जिस तरह से ऩ्यायपालिका की कहानी बयां की है और कहा है कि यदि वह अपनी बात नहीं कहते तो उनकी आत्मा कहती की उन्होंने न्याय ही का सौदा कर लिया है यह वक्तव्य ही बहुत चिंताजनक है।
चारों न्यायाधीशों के शब्द थोड़े में बहुत कुछ कह दिया है। सूत्रों का कहना है की चारो न्यायाधीशों के आरोप के बाद उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का दो खेल सोशल मीडिया के माध्यम से शुरु हुआ है वह काफी गंभीर मामला है। पिछले कई समय से यह देखा जा रहा है की मोदी सरकार के सामने बोलनेवाले को किसी न किसी तरह से परेशान किए जाने का प्रकरण आता रहा है। चारों न्यायाधीशों ने अपनी प्रतिष्ठा और जान जोखिम में डालकर लोकतंत्र को बचाने के लिए जनता की अदालत में अब अपनी बातें रख दी हैं। न्यायाधीशों ने अपनी बात रखने के लिए जिस तरह से मीडिया का सहारा लिया है उससे यह भी साफ हो जाता है कि मीडिया लोकतंत्र की चौथा सबसे मजबूत स्तंभ है।
सूत्रों की माने तो देश के मुख्य न्यायाधीश पर जो आरोप लगा है, वह सत्य साबित होता है तो मुख्य न्यायाधीश पर महाभियोग चलाने की मांग मोदी सरकार से हो सकती है। पहले भी यह प्रक्रिया हो चुकी है तो अब यह प्रणाली नई नहीं मानी जाएगी। इस बीच भाजपा के वरिष्ठ नेता और सांसद सुब्रमण्यमस्वामी ने चार न्यायाधीशों को ईमानदार और योग्य न्यायाधीश बताते हुए प्रधानमंत्री मोदी से हस्ताक्षेप करने की मांग की है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो देश में इसका प्रतिकूल असर दिखाई दे सकता है।

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