सपा को झटका नहीं, भाजपा को भारी पड़ेंगे नरेश अग्रवाल

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नई दिल्ली। नेहरू अपनी पूरी जिंदगी गुलाब कोट में लगाए राजनीति करते रहे। अटल बिहारी कमल को अपना सबकुछ मानते रहे। आडवाणी तो इतनी दुर्गति के बावजूद अभी तक कमल की ओट में नतमस्तक पड़े हैं। यहां तक कि शाहनवाज़ हुसैन भी अपनी लगातार हो रही उपेक्षा के बावजूद भाजपा में हैं। लेकिन राजनीति में एक फूल नहीं, अलग-अलग फूलों के पूरे गुलदस्ते से प्यार करने वाले शख्स को इन लोगों की स्टाइल वाली राजनीति से कोई सरोकार नहीं। वो अपनी पसंद का फूल चुनते हैं और उसे लेकर इतराते फिरते हैं। जब एक फूल से मन भर जाता है, दूसरा उठा लेते हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश से आने वाले राज्यसभा सांसद नरेश अग्रवाल की।
नरेश अग्रवाल ने देखा कि राज्यसभा में बने रहने का रास्ता फिलहाल समाजवादी पार्टी की ओर से बंद हो रहा है तो नाराज़ होकर पार्टी छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए। लेकिन नरेश अग्रवाल ऐसा पहली बार नहीं कर रहे हैं। वो उत्तर प्रदेश के रामबिलास पासवान हैं। ऐसा कई बार कर चुके हैं। दशक बीतने से पहले नरेश अग्रवाल पार्टी बदल लेते हैं। कांग्रेस, लोकतांत्रिक कांग्रेस, बसपा और सपा होते हुए अब भाजपा में पहुंच गए हैं। तो क्या नरेश अग्रवाल का भाजपा में जाना समाजवादी पार्टी को एक झटका है। शुरुआती तौर पर ऐसा लग सकता है क्योंकि नरेश अग्रवाल के जाने से सपा की बसपा के प्रत्याशी को राज्यसभा भेजने की तैयारी फेल होती नजऱ आ रही है। लेकिन लंबी दूरी में नरेश अग्रवाल सपा नहीं, भाजपा के लिए आफत साबित होने वाले हैं, यह भी साफ दिखाई दे रहा है।
भाजपा में शामिल होते हुए नरेश अग्रवाल ने जया बच्चन को राज्यसभा भेजने के प्रति अपनी असहमति जाहिर करते हुए कहा कि नाचने गाने वाली को उनसे ज़्यादा तरजीह दी गई। इस बयान को लेकर उनका विरोध भाजपा में ही शुरू हो गया है। भाजपा की महिला नेताओं की ओर से उनके बयान की कड़ी निंदा की गई है। सुषमा स्वराज और स्मृति ईरानी इस फेहरिश्त में शामिल हैं। दूसरी बात यह है कि नरेश अग्रवाल के खिलाफ हरदोई के जो भाजपा नेता और कार्यकर्ता पिछले कई वर्षों से लगातार लड़ते आए हैं, वो अब उनका झंडा उठाने को मजबूर होंगे। पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए यह नि:संदेह के हताशा वाली स्थिति होगी। हालांकि भाजपा नेतृत्व को फौरी तौर पर यह छोटा नुकसान लग सकता है लेकिन काडर बेस्ड पार्टी होने के नाते यह कइयों का दिल दुखाने के लिए काफी है और इसके दूरगामी नुकसान भी हैं।
सपा को राहत
उधर समाजवादी पार्टी का नेतृत्व और कार्यकर्ता नरेश अग्रवाल से मुक्त होकर आज खुश ज़रूर होंगे। यह सही है कि जया बच्चन को फिर से राज्यसभा भेजने पर पार्टी में नीचे का कार्यकर्ता निराश ज़रूर हुआ है और उसे इस फैसले का कोई सीधा लाभ पार्टी को होता नजऱ नहीं आ रहा है। बाहर भी इस चयन को लेकर पार्टी की खासी किरकिरी हो चुकी है। लेकिन नरेश अग्रवाल के जाने से सपा नेता और अखिलेश यादव के निकटस्थ रामगोपाल यादव के अलावा किसी और को दुख हुआ होगा, ऐसा कतई नहीं लगता। और पार्टी के पास इसके तार्किक कारण भी हैं।
पहला तो यह कि नरेश अग्रवाल पार्टी के लिए किसी भी तरह से वोटबैंक वाले नेता नहीं थे। अपनी सीट और हरदोई में अपने प्रभाव के अलावा नरेश अग्रवाल के पास सपा को देने के लिए कुछ भी नहीं था। नरेश अग्रवाल जिस बिरादरी से आते हैं, वो पारंपरिक रूप से भाजपा की वोटर रही है।

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