माल्या पर शिकंजा

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अरबों रूपए हड़प कर ब्रिटेन भागे बहुचर्चित शराब कारोबारी विजय माल्या से सरकारी बैंकें वसूली करने में नाकाम रही लेकिन अब उस पर वसूली के लिए शिकंजा कसता नजर आने लगा है। ब्रिटेन के एक हाइकोर्ट एक फैसले से माल्या को कर्ज देने वाली भारतीय तेरह बैंकों ने राहत की सांस ली होगी। नौ हजार करोड़ रुपए की बैंक धोखाधड़ी और काला धन सफेद करने का आरोपी माल्या फरार है। भारत सरकार माल्या का प्रत्यर्पण चाहती है,लेकिन ब्रिटेन भारतीय एजेंसियों की ओर से दाखिल प्रत्यर्पण की अर्जी का विरोध करता रहा है। ब्रिटिश हाइकोर्ट ने प्रवर्तन अधिकारी और उसके एजेंटों को लंदन के पास हर्टफोर्डशायर में स्थित माल्या की संपत्तियों में प्रवेश करने और तलाशी लेने की इजाजत दे दी है। एजेंटों को बल प्रयोग का भी अधिकार होगा और प्रवर्तन अधिकारी जांच के दौरान पुलिस की भी मदद ले सकेंगे। अगर जरूरत हुई तो इन संपत्तियों को बेच कर बैंकों का कर्ज चुकाया जा सकता है। यह आदेश बहुत जरूरी था, और यह भारतीय अदालतों के इस रुख की पुष्टि करता है कि कर्ज देने वाले बैंक को अपना बकाया वसूलने का अधिकार है। इसके साथ ही भारत में चल रही कार्यवाही से भी माल्या को झटका लगा है। दिल्ली की एक अदालत में बेंगलुरु पुलिस की तरफ से दी गई सूचना के मुताबिक माल्या की 159 संपत्तियों की पहचान हो चुकी है, हालांकि उनकी कुर्की नहीं की जा सकी है। जबकि अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय के आवेदन पर ही संपत्तियां कुर्क करने का आदेश दिया था। अब निदेशालय ने नई संपत्तियों की पहचान की जरूरत बता कर और मोहलत मांग ली है। दरअसल, यह माल्या के खिलाफ विदेशी मुद्रा विनिमय अधिनियम के उल्लंघन का मामला है, क्योंकि उसने अपनी किंगफिशर एअरलाइंस के प्रमोशन की खातिर ब्रिटेन में फार्मूला वन रेस के लिए दो लाख पाउंड दिए थे, पर नियमों को ताक पर रख कर। चूंकि कर्ज लेकर न चुकाने का माल्या का मामला काफी चर्चित हो चुका है और इस पर पूरे देश की नजर है, इसलिए याचिकाकर्ता बैंकों से लेकर जांच और अभियोजन एजेंसियों की सक्रियता साफ नजर आती है। लेकिन बड़ी-बड़ी राशि के कर्जों के बहुत सारे मामलों में हर स्तर पर सुस्ती और ढिलाई का आलम बना रहा है। नतीजतन बैंकों का एनपीए रिकार्ड स्तर पर पहुंच चुका है। इनमें सरकारी बैंकों की हालत ज्यादा खराब है। वैसे दो-चार लाख का कर्ज देते समय भी सरकारी बैंक काफी सावधानी बरतते हैं, हर स्तर पर छानबीन करते हैं, बकाया वसूलने के लिए कुर्की-जब्ती तक सारे अधिकार इस्तेमाल करते हैं लेकिन सैकड़ों और हजारों करोड़ के बकाएदारों का कुछ नहीं बिगड़ता। वे लिये हुए कर्ज के ‘पुनर्गठन’ की मांग करते हैं, और अकसर यह मांग मंजूर कर उन्हें भारी छूट दे दी जाती है। यही नहीं, कई बड़े-बड़े बकायों की कभी वसूली नहीं हो पाती और उन्हें बट्टे खाते में डाल दिया जाता है। इससे बैंकों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है, उनकी कारोबारी क्षमता घट जाती है। फिर, बैंकों को सहारा देने के लिए सरकारी खजाने से यानी जनता के पैसे से हजारों करोड़ रुपए का पैकेज मंजूर किया जाता है। इसलिए बात माल्या तक सीमित नहीं है। एनपीए के रिकार्ड स्तर तक पहुंच जाने के दोषी और भी हैं और सरकार को उन पर शिकंजा कसने की रणनीति बनानी चाहिए और उसे अमल में लाना चाहिए।

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