भागवत का ‘राम’ बाण कितना सटीक साबित होगा?

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अभिनव भारद्वाज
अयोध्या की विवादित भूमि का मामला सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन है। उसकी सुनवाई 29 अक्तूबर से रोजाना शुरू हो जाएगी। यह घोषणा पहले ही की जा चुकी है, लेकिन सरसंघचालक मोहन भागवत ने एक बार फिर दावा किया है कि अयोध्या में राम मंदिर ही बनेगा, कुछ और नहीं बन सकेगा। यह दावा शीर्ष अदालत की सुनवाई और फैसले से पहले ही किया जा रहा है। उनके इस दावे ने फिर इस मुद्दे को गरमा दिया है। भाजपा में मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, नेता और प्रवक्ता इतने आश्वस्त क्यों हैं कि सुप्रीम कोर्ट राम मंदिर के पक्ष में ही फैसला देगी? यह संवैधानिक अतिक्रमण का सवाल भी है। संघ प्रमुख भागवत ने कहा है कि राम मंदिर पर जो विपक्षी पार्टियां अभी तक विरोध करती आई हैं, अब राम मंदिर निर्माण शुरू होने के बाद वे विरोध नहीं करेंगी। संघ प्रमुख ने बेहद गंभीर दावा किया है।
उन्होंने मोदी सरकार को स्पष्ट संकेत दिया है कि वह राम मंदिर पर पहल करें, विपक्षी पार्टियां उनका समर्थन करेंगी। कांग्रेस समेत किसी भी विपक्षी दल ने ‘भागवत के दावे’ का विरोध या खंडन नहीं किया है। ओवैसी की पार्टी के प्रवक्ता अनाप-शनाप दलीलें दे रहे हैं, जो इस पूरे संदर्भ में अप्रासंगिक और फिजूल हैं। तो क्या भागवत ने ‘राम बाण’ चलाकर मोदी सरकार को रास्ता सुझा दिया है कि संसद में कानून के जरिए अथवा कैबिनेट द्वारा अध्यादेश पारित कर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की शुरुआत की जाए? क्या संघ-प्रमुख ने अदालत के बाहर एक व्यापक सहमति बनाने का भी सुझाव दिया है? क्या राम मंदिर प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के लिए जरूरी और राहुल कांग्रेस की मजबूरी है? भागवत के भरोसे का आधार यह भी है कि भगवान राम देश की बहुसंख्यक आबादी के इष्टदेव हैं। अब कोई विरोध करेगा, तो उसके दोगलेपन का पर्दाफाश होगा! गौरतलब है कि देश में करीब 85 करोड़ मतदाता हैं। उनमें से करीब 67 करोड़ हिंदू और करीब 12 करोड़ मुस्लिम मतदाता हैं। करीब 6 करोड़ मतदाता अन्य समुदायों के हैं। क्या संघ-प्रमुख यह दावा करके हिंदू वोटरों को गोलबंद करने की राजनीति कर रहे हैं? क्या सरसंघचालक का भरोसा यह है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मंदिर-मंदिर, पूजा-पाठ कर अंतत: धर्म की राजनीति ही खेल रहे हैं, लिहाजा कांग्रेस भी खुलेआम रामलला के मंदिर को समर्थन देगी? इस मुद्दे पर मुसलमान कई खेमों में बंटे दिखाई दे रहे हैं। कथित बाबरी मस्जिद के अदालत में मुख्य पक्षकार इकबाल अंसारी कहते हैं कि राम मंदिर बनाने पर मुस्लिमों को एतराज नहीं है। ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के मौलाना साजिद रशीदी का दो टूक कहना है-जो सच्चा मुसलमान होगा, वह राम मंदिर का समर्थन कर ही नहीं सकता। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी शीर्ष अदालत के फैसले का इंतजार कर रहा है। बेशक सुप्रीम कोर्ट का फैसला कुछ भी रहे, उसके बावजूद राजनीतिक-सामाजिक समाधान जरूरी हैं।
आपस में सौहार्द बनाए रखना लाजिमी है। मुस्लिम पक्षकार बार-बार दलीलें दे रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट विवादित भूमि की मिलकीयत का मामला ही देखेगी, आस्था और धार्मिक भावनाओं से फिलहाल उसका कोई सरोकार नहीं है, लेकिन भागवत समेत संघ और भाजपा के तमाम नेता राम मंदिर को अपनी ‘आस्था वाली प्रतिबद्धता’ के तौर पर प्रचारित कर रहे हैं। राजनीतिक तौर पर भी अयोध्या में अंतरराष्ट्रीय जश्न की तैयारियां चल रही हैं। इस बार दीवाली पर अयोध्या में सरयू नदी के तट पर 3 लाख दीपक जलाए जाएंगे। यूपी के राज्यपाल राम नाइक और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भगवान राम की आरतियों में हिस्सा लेंगे। तीन दिनों तक चलने वाले कार्यक्रमों में इंडोनेशिया और श्रीलंका के कलाकार अलग-अलग रामलीला का मंचन करेंगे। अयोध्या में इस जश्न की जरूरत क्या है? विडंबना है कि जिन मुद्दों पर 2019 के चुनाव लड़े जाएंगे, उनमें राम मंदिर भी एक है। परोक्ष रूप से बेहतर ही होगा कि अयोध्या विवाद सुलट जाए और पार्टियों की राजनीतिक दुकानदारी बंद हो जाए और दूसरे सामाजिक-मानवीय मुद्दों पर विमर्श और मंथन किया जाए। संघ और भाजपा का भरोसा इसलिए भी बढ़ा है, क्योंकि कांग्रेस भी ‘हर-हर राहुल’ और ‘बम-बम भोले’ के नारे लगा रही है, समाजवादी पार्टी ने इटावा में विष्णु मंदिर बनाने की घोषणा की है। भाजपा के लिए देश भर में कांग्रेस ही मायने रखती है, क्योंकि जनता विकल्प के तौर पर भाजपा की जगह लेना चाहती है। दूसरे क्षेत्रीय दल राम मंदिर-मस्जिद के विवाद से अलग ही रहे हैं। बहरहाल फिर भी देखना होगा कि भागवत का ‘राम बाण’ कितना सटीक साबित होता है और भाजपा फिर से केंद्र की सत्ता पर काबिज हो पाती है।

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