जब परेशानियों से घिरे हों तब इन बातों पर करें गौर

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अध्यात्म के मार्ग पर तीन कारक हैं- बुद्ध- सद्गुरु या ब्रह्मज्ञानी का सान्निध्य। संघ-संप्रदाय या समूह। और तीसरा धर्म यानी कि तुम्हारा सच्चा स्वभाव। जब इन तीनों का संतुलन होता है, तब जीवन स्वाभाविक रूप से खिल उठता है।
बुद्ध या सतगुरु एक प्रवेश द्वार की तरह है। मानो तुम बाहर रास्ते पर तपती धूप में हो या तूफानी बारिश में फंस गए हो, तब तुम्हें शरण या द्वार की आवश्यकता महसूस होगी। इस पर गौर करना कि उस समय वह द्वार बहुत आकर्षक और मनोहर लगेगा।
वह तुम्हें दुनिया की किसी भी चीज से ज्यादा आनंददायक लगेगा। ठीक ऐसे ही तुम गुरु के जितने करीब होगे, तुम्हें उतना ज्यादा आकर्षण, ज्यादा नयापन और ज्यादा प्रेम महसूस होगा। दुनिया की कोई भी चीज, तुम्हें वैसी शांति, आनंद और सुख नहीं दे सकेगी। तुम ब्रह्मज्ञानी से कभी भी ऊबोगे नहीं। उनकी गहराई की कोई थाह नहीं है। एक बार तुम द्वार पर पहुंच कर प्रवेश कर जाते हो, तब संसार बहुत अधिक सुंदर लगने लगता है। यह एक ऐसा स्थान है जो कि प्रेम, आनंद, सहयोग, करुणा और सब सद्गुणों से भरा हुआ है। दरवाजे से बाहर देखने में कोई डर नहीं लगता।
अपने घर के अंदर से तुम कडक़ड़ाती बिजली को देख सकते हो, तूफान को देख सकते हो और प्रचण्ड सूरज को भी देख सकते हो, और ये सब देखने के बावजूद भी निश्चिंत रहते हो क्योंकि तुम गुरु के आश्रय में हो। यहां पर हम सुरक्षित, पूर्ण और आनंद में रहते हैं। गुरु के होने का यही आशय है।
दूसरा तत्व है संघ या समूह। यह समूह दूर से बहुत सुंदर दिखता है, पर जैसे ही तुम इसके समीप जाते हो, यह तुम्हारी सभी संवेदनशील रगों को दबाने लगता है और तुम्हारी अंदर के सभी अनचाहे गुणों को खींच कर बाहर लाता है।
यदि तुम यह सोचते हो कि समूह बहुत अच्छा है या बहुत बुरा है तो इसका अर्थ है कि तुम पूरी तरह से समूह के साथ नहीं हो और अगर तुम पूरी तरह से समूह के साथ नहीं हो तो कोई न कोई कलह जरूर पाओगे। पर तुम भी उस समूह का एक हिस्सा हो, तो अगर तुम अच्छे हो तो समूह भी अच्छा होगा।
संघ का स्वभाव बुद्ध से बिल्कुल उल्टा है। बुद्ध मन को केंद्रित करते हैं, संघ में, क्योंकि ज्यादा लोग हैं, मन बिखर जाता है, टुकड़ों में बंट जाता है। जैसे ही तुम इसके आदि हो जाते हो, इसका आकर्षण समाप्त हो जाता है।
यह संघ का स्वभाव है। फिर भी इससे बहुत सहारा मिलता है। अगर इसमें हर समय विकर्षण होता तो कोई भी व्यक्ति संघ का हिस्सा नहीं बनता। न ही राग रखो और न ही द्वेष। प्राय: तुम बुद्ध के लिए राग रखते हो और संघ के प्रति द्वेष और फिर उसे बदलना चाहते हो, लेकिन बुद्ध या संघ को बदलने से तुम बदलने वाले नहीं हो।
मुख्य उद्देश्य है तुम्हारे अंतरम गहराई के केंद्र तक पहुंचना, जिसका अर्थ है अपने धर्म को पाना। यह तीसरा कारक है। धर्म क्या है? धर्म मध्य में रहने को कहते हैं। अतिवाद की ओर नहीं जाना ही तुम्हारा स्वभाव है।
तुम्हारा स्वभाव है मध्य में, संतुलन में रहना, दिल की गहराइयों से मुस्कुराना, पूरे अस्तित्व को जैसे है वैसा ही पूर्ण रूप से स्वीकार करना। यह जानना कि ये क्षण जैसा भी मेरे सामने रखा गया है, मैं वैसा ही उसे स्वीकारता हूं। इस पल और हरेक पल का अंदर से स्वीकार की भावना ही धर्म है।
जब यह समझ आती है तब कोई समस्या नहीं रहती। सभी समस्याएं मन की ही उपज हैं, सभी नकारात्मकता हमारे मन के अंदर से ही आती है। संसार बुरा नहीं है, हम उसे सुन्दर या कुरूप बनाते हैं। जब तुम अपने धर्म में, अपने स्वभाव में स्थित होते हो, तुम दुनिया को दोष नहीं देते, भगवान को दोष नहीं देते। मानव मन की मुश्किल ही यही है कि यह पूरी तरह से विश्व का हिस्सा नहीं बन पाता, न ही यह दिव्यता का हिस्सा बन पाता है। वह दिव्यता से दूरी महसूस करता है। धर्म वह है जो तुम्हें बीच में रखता है संसार के साथ सुगमतापूर्वक निभाना सिखाता है। यह तुम्हें संसार में अपना योगदान भी दिलवाता है, दिव्यता के साथ आराम से रह कर तुम्हें उस दिव्यता का हिस्सा होने का एहसास दिलाता है। वही सच्चा धर्म है।

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